राष्ट्रपति चुनाव के बाद उप राष्ट्रपति पद के चुनाव में भी विपक्षी पार्टियों की एकता एक्सपोज हो गई। राष्ट्रपति चुनाव में साझा विपक्षी उम्मीदवार को वोट नहीं देने वाली दो पार्टियां इस बार विपक्षी खेमे में लौटीं तो दो बड़ी विपक्षी पार्टियां बाहर हो गईं। भाजपा के खिलाफ सबसे ज्यादा लड़ाई का मोर्चा खोलने वाली और विपक्षी एकता के लिए सबसे ज्यादा हायतौबा मचाने वाली ममता बनर्जी ने ही विपक्ष के उम्मीदवार को वोट नहीं दिया। उन्होंने अपने 36 सांसदों को वोटिंग से अलग रहने को कहा था, जिनमें से दो ने भाजपा उम्मीदवार को वोट किया। अगर उनके 34 सांसद वोट करते तो मार्गरेट अल्वा के वोट दो सौ से ज्यादा होते।
इसी तरह शिव सेना के सात सांसदों ने भी वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया। ये सात सांसद उद्धव ठाकरे खेमे के हैं। एकनाथ शिंदे खेमे के सांसदों ने भाजपा के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ को वोट किया। पिछली बार दबाव में आकर उद्धव ने अपने सांसदों को एनडीए उम्मीदवार को वोट देने को कहा था। लेकिन इस बार वे चुप रहे। सो, उनके खेमे के सांसद नदारद रहे। तीन सांसदों वाली पार्टी जेएमएम ने इस बार विपक्ष की उम्मीदवार को वोट किया। यह भी झारखंड की बड़ी ईसाई आबादी ध्यान में रख कर किया गया फैसला था। आम आदमी पार्टी ने भी विपक्ष की उम्मीदवार अल्वा को समर्थन दिया। कई पार्टियों ने विपक्ष की उम्मीदवार को वोट किया लेकिन उनके समर्थन में कोई काम नहीं किया। ऐसा नहीं लगा कि उप राष्ट्रपति चुनाव के मौके का विपक्ष कोई फायदा उठा सका।






