सतीश मुखिया
मथुरा: वैसे लिखने को मन तो कर नहीं रहा मगर लिखना पड़ रहा है कि आज विभिन्न कारणों से विधानसभाओं में रिक्त हुई सीटों पर उपचुनाव की मतगणना हो रही है जिसमें बांकीपुर विधानसभा, बिहार/ दतिया विधानसभा, मध्य प्रदेश और मांजलपुर विधानसभा, गुजरात मुख्य रूप से शामिल है अभी गिनती चल रही है और ऐसा देखने में प्रतीत हो रहा है कि जिस पार्टी की प्रदेश में सरकार है उस पार्टी का प्रत्याशी लगभग चुनाव हारने की कगार पर खड़ा हुआ है।
अब सवाल यह उठता है कि जब जनता द्वारा राज्य की सत्ता चलाने हेतु इस दल को पूर्ण बहुमत दिया गया है तब ऐसा क्या कारण उत्पन्न हो गए जिस कारण से वह अपनी जीती हुई सीट को भी वापस जीत नहीं पा रही है अब हम चर्चा करना चाहेंगे कि देश में पहले होते थे खाटी नेता, जमीनी नेता लेकिन जब से सोशल मीडिया का दौर आया है तब से नेता जमीन पर कम सोशल मीडिया पर ज्यादा दिखाई पड़ते हैं।
विश्व की सबसे बड़ी पार्टी और उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के कारण रिक्त हुई विधानसभा सीट भी पार्टी खोने जा रही है जो कि पिछले कई चुनाव से उसका गढ़ बन चुकी थी वहीं दूसरी तरफ मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर दतिया विधानसभा मध्य प्रदेश में नए चेहरे को दिया गया विधायक की का टिकट भी कारगर होता हुआ नजर नहीं आ रहा है और वह लगभग चुनाव हारने की कगार पर है।
उपचुनाव में बढ़त सत्ताधारी पक्ष को ही होती है लेकिन आज जारी गणना के अनुसार सत्ताधारी पक्ष दो प्रदेशों में अपनी जीती हुई सीटों को हार चुका है जो कि उसके लिए एक बड़ा ही कुठारा घात है और उसकी राजनीति पर सवाल तो पैदा करता ही है….
आज नीति की पहचान उसके जमीन पर कार्य करने से नहीं उसके गाड़ी घोड़े और उसके सोशल मीडिया के फॉलोअर्स से हो रही है लेकिन यह ठीक है कि सोशल मीडिया का जमाना है सोशल मीडिया का इस्तेमाल होना चाहिए लेकिन जमीन पर भी उतरकर कार्य करने की आवश्यकता प्रतीत होती है क्योंकि हर वोट जरूरी है और वोट मतदान केंद्र में ही पड़ता है।
आजकल लोगों को चुनाव जीतने का ठेका भी लिया जाता है क्यों ना लिया जाए क्योंकि पार्टियों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों की तरह जो चलाया जा रहा है । इस चुनाव की एकमात्र खूबी यह रही कि विपक्ष को फिर एक बार फिर से ऑक्सीजन मिल गई जो कि खुद वेंटिलेटर पर था।







