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पाकिस्तान से भाग रही हैं कंपनियां, क्या डूबने वाला है देश?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
December 22, 2025
in विश्व
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Pakistan
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नई दिल्ली। एक ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पाकिस्तान को ‘क्रिप्टो करेंसी हब’ बनाने की महत्वाकांक्षी योजनाएं साझा कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर बहुराष्‍ट्रीय कंपनियां पाकिस्‍तान से अपना बोरिया-बिस्‍तर समेट रही हैं. पिछले दो वर्षों (2023-2025) में लगभग 25 नामी बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) ने पाकिस्तान को बाय-बाय बोल दिया है. पाकिस्तान की बाजार स्थितियों ने उन कंपनियों को भी हार मानने पर मजबूर कर दिया है जो दशकों से वहां जमी हुई थीं. यह केवल व्यापारिक घाटा नहीं, बल्कि एक ऐसे देश की तस्वीर है जो धीरे-धीरे वैश्विक निवेश मानचित्र से गायब होता जा रहा है.

डोनाल्ड ट्रंप की योजना पाकिस्तान को भले ही डिजिटल करेंसी के जरिए उबारने की हो हो, लेकिन जब तक देश की बुनियादी ढांचागत और राजनीतिक नींव कमजोर है, तब तक शायद ही पाकिस्‍तान के दिन फिरे. यह बात बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों के आकाओं को अच्‍छी तरह से पता है और यही वजह है कि वे पाकिस्‍तान छोड़ने में ही अपनी भलाई मान रही है. कंपनियों के जाने का सीधा असर रोजगार पर पड़ा है. हजारों स्किल्ड प्रोफेशनल्स बेरोजगार हो रहे हैं. अगर पाकिस्तान ने जल्द प्रशासनिक सुधार नहीं किए और राजनीतिक स्थिरता बहाल नहीं की, तो आने वाले समय में ‘इंपोर्ट बेस’ कंपनियां भी वहां से रुख मोड़ सकती हैं.
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माइक्रोसॉफ्ट से शेल तक सब हुए विदा
इस साल माइक्रोसॉफ्ट ने पाकिस्तान में अपने 25 साल पुराने स्थानीय कार्यालय को बंद करने का फैसला किया. यह कदम वैश्विक टेक जगत के लिए एक बड़ा संकेत था कि पाकिस्तान का डिजिटल और कॉर्पोरेट भविष्य अंधकार में है. ऊर्जा क्षेत्र की दिग्‍गज नाम शेल (Shell) और टोटल एनर्जी (TotalEnergies) ने अपनी पूरी हिस्सेदारी सऊदी अरब की कंपनियों को बेचकर बाहर निकलने का रास्ता चुना.

शेल ने जून 2023 में बाहर निकलने की घोषणा की और विदेशी मुद्रा के गंभीर संकट को इसकी मुख्य वजह बताया. ऑटो सेक्टर में यामाहा (Yamaha) ने भी पाकिस्तान को अलविदा कह दिया है. एफएमसीजी (FMCG) क्षेत्र की दिग्गज कंपनी प्रॉक्टर एंड गैंबल (P&G) ने अक्टूबर 2025 में अपनी मैन्युफैक्चरिंग बंद कर थर्ड-पार्टी डिस्ट्रीब्यूशन मॉडल अपना लिया, जो सीधे तौर पर यह दर्शाता है कि अब पाकिस्तान में फैक्ट्री चलाना संभव नहीं रह गया है.

फार्मा सेक्टर में मची सबसे ज्‍यादा भगदड़
पाकिस्तान में कंपनियों के पलायन का सबसे बुरा असर स्वास्थ्य क्षेत्र यानी फार्मास्युटिकल सेक्टर पर पड़ा है. पिछले 24 महीनों में करीब 12 बड़ी मल्टीनेशनल फार्मा कंपनियों ने अपने ऑपरेशंस खत्म कर दिए हैं. अमेरिकी दवा कंपनी फाइजर ने मई 2024 में कराची स्थित अपने प्रतिष्ठित प्लांट और मैन्युफैक्चरिंग ऑपरेशंस को बेच दिया. अब कंपनी केवल आयात आधारित डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क तक सीमित रह गई है. फ्रांस की सैनोफी और जर्मनी की बायर ने भी 2023 के दौरान पाकिस्‍तान को अलविदा कह दिया. इसी तरह एली लिली ने भी मुद्रा में भारी उतार-चढ़ाव और रेगुलेटरी मंजूरियों में होने वाली अंतहीन देरी के कारण पाकिस्‍तानी बाजार छोड़ दिया.

उबर, केयरम ने पाकिस्‍तान को कहा अलविदा
आम जनता के लिए आवाजाही सुगम बनाने वाली उबर (Uber) ने 2024 तक अपने ऑपरेशंस पूरी तरह बंद कर दिए, जबकि केयरम (Careem) ने जुलाई 2025 में अपनी राइड-हेलिंग सेवाएं सस्पेंड कर दीं. पेट्रोल-डीजल की आसमान छूती कीमतों और लोगों की घटती क्रय शक्ति के कारण राइड-हेलिंग अब पाकिस्तान में एक घाटे का सौदा बन चुका है. टेलीकॉम क्षेत्र में भी नॉर्वे की टेलीनॉर अपनी हिस्सेदारी बेचकर बाहर निकल रही है, जिसे ऊंची बिजली लागत और टैक्स के बोझ ने पस्त कर दिया है.

अर्थव्यवस्था की तबाही के तीन सबसे बड़े ‘विलेन’
आर्थिक विशेषज्ञों और निवेश विश्लेषकों ने पाकिस्तान की इस दुर्दशा के पीछे तीन बुनियादी कारण हैं. आइये इनके बारे में जानते हैं..

1. स्किल्ड वर्कफोर्स का भारी अभाव : किसी भी मल्टीनेशनल कंपनी को चलाने के लिए कुशल कार्यबल (Skilled Workforce) की आवश्यकता होती है. आंकड़ों के अनुसार, पाकिस्तान की कुल कामकाजी आबादी का मात्र 8% हिस्सा ही प्रीमियम स्किल कैटेगरी में आता है. शेष आबादी या तो मैनुअल लेबर है या केवल बुनियादी मैकेनिकल काम कर सकती है. वैश्विक कंपनियों के आधुनिक और तकनीकी प्रोफाइल में यह वर्कफोर्स फिट नहीं बैठता, जिससे कंपनियों की ऑपरेशनल कॉस्ट बढ़ जाती है. जब ढंग के कर्मचारी ही नहीं मिलेंगे तो कंपनियां क्‍या करेंगी.

2. सिकुड़ता मिडिल क्लास और बढती गरीबी : मल्टीनेशनल कंपनियों के उत्पादों को एक मजबूत ‘कंज्यूमर बेस’ चाहिए होता है, जो आमतौर पर मिडिल क्लास (मध्यम वर्ग) होता है. पाकिस्तान की लगभग 26 करोड़ की आबादी में से 68% लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं. मध्यम वर्ग सिमटकर मात्र 22% रह गया है. जब लोगों के पास बुनियादी जरूरतों (रोटी, कपड़ा, मकान) के लिए पैसे नहीं हैं, तो वे ब्रांडेड कपड़े, इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स या प्रीमियम सेवाएं कैसे खरीदेंगे.

3. राजनीतिक अस्थिरता : पाकिस्तान में सत्ता का संघर्ष चरम पर है. पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की गिरफ्तारी और मौजूदा शरीफ सरकार के घटते जनाधार ने एक ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ (नीतिगत जड़ता) की स्थिति पैदा कर दी है. कोई भी निवेशक ऐसी जगह पैसा नहीं लगाना चाहता जहां अगले 6 महीनों में सरकार या सुरक्षा की कोई गारंटी न हो. इसके ऊपर अफगानिस्तान के साथ युद्ध जैसे हालात और सीमा पर बढ़ते तनाव ने सुरक्षा संबंधी चिंताओं को बढ़ा दिया है.

मुनाफे की निकासी पर पाबंदी
पाकिस्तान ने अपने विदेशी मुद्रा भंडार को बचाने के लिए ‘प्रॉफिट रिपैट्रिएशन’ (मुनाफे को अपने देश वापस भेजना) पर सख्त पाबंदियां लगा रखी हैं. शेल, टेलीनॉर और उबर जैसी कंपनियों के लिए यह सबसे बड़ी बाधा बनी. जब एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी पाकिस्तान में कारोबार करके कमाया गया मुनाफा अपने हेडक्वार्टर नहीं भेज सकती, तो उसके लिए वहां टिके रहने का कोई तर्क नहीं रह जाता. इसके साथ ही, ऊंचे टैक्स और जटिल रेगुलेटरी माहौल ने ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को पूरी तरह खत्म कर दिया है.

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