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Home धर्म

क्या आप आरती के बाद मंत्र पुष्पांजलि के महत्व के बारे में जानते हैं?

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
May 18, 2026
in धर्म
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मंत्र पुष्पांजलि
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नई दिल्ली। हिन्दू धर्म में किसी भी पूजा, व्रत, अनुष्ठान या आरती के बाद भगवान को फूल अर्पित करने की एक विशेष परंपरा है। लेकिन, जब आप देवताओं को मंत्रों के उच्चारण के साथ फूल अर्पित करते हैं, तो इसे ‘मंत्र पुष्पांजलि’ कहा जाता है। इससे पूजा का महत्व और मिलने वाले लाभ कई गुना बढ़ जाते हैं।

क्या है मंत्र पुष्पांजलि का अर्थ?

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मंत्र पुष्पांजलि तीन शब्दों से मिलकर बना है- ‘मंत्र’ (वैदिक श्लोक), ‘पुष्प’ (फूल) और ‘अंजलि’ (हथेलियों को जोड़कर बनाई गई मुद्रा)। आरती के बाद देवी-देवताओं को सम्मान देने के लिए अपनी दोनों हथेलियों को जोड़कर उसमें फूल रखे जाते हैं। इसके बाद विशेष मंत्रों का जप किया जाता है और जाप समाप्त होते ही वे फूल भगवान के चरणों में अर्पित कर दिए जाते हैं।

मंत्र पुष्पांजलि का महत्व

  • यह सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि भगवान के प्रति हमारी श्रद्धा, भक्ति और प्रेम को प्रकट करने का एक सुंदर तरीका है।
  • मंत्रों के साथ फूल अर्पित करने से मन और विचारों की शुद्धि होती है।
  • इससे साधक को गहरी आध्यात्मिक शांति और संतोष मिलता है।
  • यह पूजा के अंत में भगवान को धन्यवाद कहने और उनसे अपने परिवार के कल्याण की प्रार्थना करने का माध्यम है।
  • मान्यता है कि मंत्र पुष्पांजलि से देवी-देवता अत्यंत प्रसन्न होते हैं और भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी करते हैं।

मंत्र पुष्पांजलि के 4 मुख्य वैदिक श्लोक और उनका अर्थ

आरती के अंत में गाए जाने वाले इस पुष्पांजलि पाठ में 4 मुख्य वैदिक श्लोक शामिल होते हैं:

प्रथम श्लोक

ॐ यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तनि धर्माणि प्रथमान्यासन् ।
ते ह नाकं महिमान: सचंत यत्र पूर्वे साध्या: संति देवा:॥

इसका अर्थ है कि देवताओं ने भी श्रेष्ठ कर्मों और यज्ञ के जरिए ही स्वर्ग प्राप्त किया है। इसका सार यह है कि केवल धर्म, पूजा और अच्छे कर्मों के माध्यम से ही मनुष्य इस दुनिया में और परलोक में सर्वश्रेष्ठ स्थान पा सकता है।

द्वितीय श्लोक

ॐ राजाधिराजाय प्रसह्य साहिने।
नमो वयं वैश्रवणाय कुर्महे।
स मस कामान् काम कामाय मह्यं।
कामेश्र्वरो वैश्रवणो ददातु कुबेराय वैश्रवणाय।
महाराजाय नम:।

इस मंत्र में देवताओं के कोषाध्यक्ष भगवान कुबेर (राजाधिराज) को नमन किया जाता है। उनसे प्रार्थना की जाती है कि वे हमारी सभी इच्छाओं को पूरा करें और हम पर अपनी कृपा बनाए रखें।

तृतीय श्लोक

ॐ स्वस्ति, साम्राज्यं भौज्यं स्वाराज्यं
वैराज्यं पारमेष्ट्यं राज्यं महाराज्यमाधिपत्यमयं ।
समन्तपर्यायीस्यात् सार्वभौमः सार्वायुषः आन्तादापरार्धात् ।
पृथीव्यै समुद्रपर्यंताया एकराळ इति ॥

प्राचीन काल में यह मंत्र राजाओं के राज्याभिषेक के समय उनकी सफलता की कामना के लिए गाया जाता था। यह श्लोक याद दिलाता है कि सफलता, लंबी आयु, स्वास्थ्य और राजपाट तभी फलदायी होता है, जब मनुष्य धर्म और सच्चाई के मार्ग का पालन करें।

चतुर्थ श्लोक

ॐ तदप्येषः श्लोकोभिगीतो।
मरुतः परिवेष्टारो मरुतस्यावसन् गृहे।
आविक्षितस्य कामप्रेर्विश्वेदेवाः सभासद इति ॥
॥ मंत्रपुष्पांजली समर्पयामि ॥

इस अंतिम श्लोक का अर्थ है कि ‘मरुत’ देव इस पूजा के समापन के गवाह (साक्षी) हैं और वे इस पूजा का शुभ फल सभी भक्तों के बीच बांटते हैं। अंत में ॥ मंत्रपुष्पांजली समर्पयामि ॥ कहकर फूल भगवान के चरणों में चढ़ा दिए जाते हैं।

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