नई दिल्ली (स्पेशल डेस्क) : देश की राजनीति में पिछले दो हफ्तों के दौरान ऐसे घटनाक्रम सामने आए हैं, जिन्होंने संसद के अंकगणित को पूरी तरह बदलकर रख दिया है। एक महीने पहले तक जिस राजनीतिक स्थिति की कल्पना करना भी मुश्किल माना जा रहा था, वह अब तेजी से हकीकत का रूप लेती दिखाई दे रही है। इन बदलते समीकरणों का सबसे बड़ा असर संसद के आगामी मानसून सत्र में देखने को मिल सकता है, जहां केंद्र सरकार महिलाओं के आरक्षण पैकेज से जुड़े संविधान संशोधन और परिसीमन बिल को दोबारा लाने की तैयारी कर रही है। आइए इस पूरे विश्लेषण को एग्जीक्यूटिव एडिटर प्रकाश मेहरा से समझते हैं।
गौरतलब है कि “इसी वर्ष अप्रैल में विपक्षी दलों की एकजुटता के कारण लोकसभा में यह महत्वपूर्ण विधेयक आवश्यक समर्थन नहीं जुटा सका था और करीब 54 वोटों की कमी के चलते पारित नहीं हो पाया था। लेकिन अब राजनीतिक हालात तेजी से बदल रहे हैं, जिससे इस बिल के पारित होने की संभावनाएं पहले के मुकाबले काफी मजबूत नजर आ रही हैं।
टीएमसी में बगावत ने बदला पूरा खेल
इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में हुई बड़ी राजनीतिक टूट को माना जा रहा है। बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद पार्टी के भीतर असंतोष बढ़ता गया और अब इसका असर संसद में भी दिखाई देने लगा है।
बताया जा रहा है कि लोकसभा में टीएमसी के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने बगावत कर अलग गुट बना लिया है। ये सांसद एक नई राजनीतिक पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ (एनसीपीआई) के साथ जुड़ गए हैं, जो जल्द ही भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन का हिस्सा बन सकती है।
महाराष्ट्र में उद्धव गुट पर भी संकट
पश्चिम बंगाल की तरह महाराष्ट्र की राजनीति में भी उथल-पुथल देखने को मिल रही है। उद्धव ठाकरे की शिवसेना के नौ लोकसभा सांसदों में से छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना गुट के साथ जाने की चर्चाएं तेज हैं।
यदि यह राजनीतिक बदलाव वास्तविकता में बदलता है तो संसद में विपक्ष की ताकत और कमजोर होगी, जबकि एनडीए की स्थिति और मजबूत हो सकती है।
कैसे मजबूत होगा एनडीए?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी और उद्धव गुट में संभावित टूट का सीधा फायदा केंद्र की एनडीए सरकार को मिलेगा। यही वजह है कि सरकार मानसून सत्र से पहले संविधान संशोधन जैसे अहम विधेयकों के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत के आंकड़े के करीब पहुंचती दिखाई दे रही है।
लोकसभा का गणित क्या कहता है?
लोकसभा की कुल 543 सीटों में फिलहाल तीन सीटें रिक्त हैं। ऐसे में प्रभावी संख्या 540 सदस्यों की है और दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सांसदों का समर्थन आवश्यक माना जाता है।
वर्तमान स्थिति में तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों को जोड़ने के बाद एनडीए के पास लगभग 318 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष के पास 184 सांसद और अन्य गैर-गठबंधन दलों के पास 38 सांसद हैं।
नियमों के अनुसार किसी संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए सदन में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के आधार पर बहुमत तय होता है। अप्रैल में सरकार को आवश्यक आंकड़े से करीब 54 वोट कम मिले थे।
बहुमत से कितनी दूर है सरकार?
यदि टीएमसी के 20 बागी सांसद और उद्धव गुट के छह संभावित बागी सांसद एनडीए के पक्ष में आते हैं तो सरकार की कमी घटकर लगभग 28 वोट रह जाएगी।
इसी बीच एक और बड़ा राजनीतिक घटनाक्रम सामने आया है। बताया जा रहा है कि तमिलनाडु की सत्तारूढ़ डीएमके और कांग्रेस के बीच संबंधों में दरार आ गई है तथा डीएमके विपक्षी इंडिया गठबंधन से अलग हो चुकी है।
सूत्रों के अनुसार केंद्र सरकार और डीएमके के बीच बातचीत जारी है। यदि डीएमके अपनी 22 लोकसभा सीटों के साथ सरकार का समर्थन करती है तो एनडीए का आंकड़ा बढ़कर 348 तक पहुंच सकता है। इसके बाद सरकार को बहुमत के लिए मात्र छह अतिरिक्त वोटों की आवश्यकता होगी।
आखिरी छह वोटों के लिए क्या है रणनीति?
राजनीतिक जानकारों और विभिन्न नेताओं के बयानों के आधार पर माना जा रहा है कि भाजपा अब उन छोटे क्षेत्रीय दलों पर नजर बनाए हुए है, जो फिलहाल किसी बड़े गठबंधन का हिस्सा नहीं हैं। माना जा रहा है कि “महाराष्ट्र समेत कुछ राज्यों की छोटी पार्टियां इस रणनीति का अहम हिस्सा बन सकती हैं और सरकार को आवश्यक समर्थन उपलब्ध करा सकती हैं।”
राज्यसभा में भी बदल सकते हैं समीकरण
राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 164 सांसदों का समर्थन जरूरी है। वर्तमान में एनडीए के पास करीब 150 सांसदों का समर्थन बताया जा रहा है। यदि डीएमके के आठ राज्यसभा सांसद भी सरकार का साथ देते हैं तो यह संख्या 158 तक पहुंच सकती है। इसके बाद सरकार बहुमत से केवल छह वोट दूर रह जाएगी।
विश्लेषकों का मानना है कि “तृणमूल कांग्रेस से संभावित इस्तीफों के बाद होने वाले उपचुनाव और अन्य छोटे दलों के सहयोग से यह अंतर भी आसानी से पूरा किया जा सकता है।”
बड़े विधेयकों का रास्ता हो सकता है साफ
कुल मिलाकर यदि केंद्र सरकार संसद के दोनों सदनों में आवश्यक समर्थन जुटाने में सफल रहती है तो आगामी मानसून सत्र में महिला आरक्षण और परिसीमन बिल की जोरदार वापसी देखने को मिल सकती है। इतना ही नहीं, ‘एक देश-एक चुनाव’ जैसे बड़े संवैधानिक सुधारों को लागू करने का रास्ता भी काफी हद तक साफ हो सकता है।
आने वाले हफ्तों में राजनीतिक दलों के बीच होने वाली बातचीत और संभावित गठबंधन बदलाव यह तय करेंगे कि संसद का यह नया गणित आखिर किस दिशा में जाता है।






