नई दिल्ली। पितृपक्ष आते ही गया जी में देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है। लोग यहां अपने पूर्वजों की शांति और सद्गति की कामना से पिंडदान और तर्पण करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर गया जी को ही पिंडदान के लिए इतना खास क्यों माना जाता है? इसके पीछे एक बेहद प्राचीन पौराणिक कथा है, जिसका संबंध गयासुर और भगवान विष्णु से बताया जाता है।
गयासुर की तपस्या से शुरू होती है कहानी
धार्मिक मान्यता के अनुसार, गयासुर नाम के एक असुर ने भगवान विष्णु को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि जो भी गयासुर को देखेगा या उसका स्पर्श करेगा, उसे पवित्रता और मोक्ष की प्राप्ति होगी। इस वरदान के बाद स्थिति ऐसी हो गई कि लोग अपने कर्मों का फल भोगने के बजाय गयासुर के दर्शन या स्पर्श से पवित्र होने लगे। इससे देवताओं को चिंता हुई और वे भगवान विष्णु के पास पहुंचे।
भगवान विष्णु ने गयासुर से मांगा उसका शरीर
मान्यता है कि देवताओं की चिंता दूर करने के लिए भगवान विष्णु ने गयासुर से एक यज्ञ के लिए उसका शरीर मांग लिया। गयासुर इसके लिए तैयार हो गया और धरती पर लेट गया। इसके बाद उसके शरीर को स्थिर रखने के लिए उसके ऊपर एक पवित्र शिला रखी गई, जिसे धर्मशिला कहा जाता है। लेकिन कथा के अनुसार गयासुर का शरीर फिर भी हिलता रहा। तब भगवान विष्णु ने स्वयं उस शिला पर अपना चरण रखा। मान्यता है कि भगवान विष्णु के चरण रखने के बाद गयासुर स्थिर हो गया। आज इसी घटना से जुड़े भगवान विष्णु के चरणचिह्न विष्णुपद मंदिर में पूजे जाते हैं।
गयासुर ने मांगा ऐसा वरदान, जिससे गया बन गया पितृतीर्थ
धार्मिक कथा के अनुसार, गयासुर ने भगवान विष्णु से मृत्यु के समय एक विशेष वरदान मांगा। उसने इच्छा जताई कि जहां तक उसका शरीर रहे, वह पूरा क्षेत्र पवित्र माना जाए और जो व्यक्ति यहां अपने पूर्वजों का पिंडदान करे, उसके पितरों को सद्गति प्राप्त हो। भगवान विष्णु ने उसकी यह इच्छा स्वीकार कर ली। इसी धार्मिक मान्यता को गया जी में पिंडदान की परंपरा से जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि इसी वजह से गया क्षेत्र को पितृ कर्म के लिए बेहद पवित्र माना गया और समय के साथ यह हिंदू धर्म के प्रमुख पितृतीर्थों में शामिल हो गया।
विष्णुपद मंदिर में हैं भगवान विष्णु के चरणचिह्न
गया जी का सबसे प्रमुख धार्मिक स्थल विष्णुपद मंदिर माना जाता है। यहां एक चट्टान पर भगवान विष्णु के चरणचिह्न माने जाने वाले पदचिह्न स्थापित हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यही वह स्थान है जहां भगवान विष्णु ने गयासुर को अपने चरणों से स्थिर किया था। श्रद्धालु यहां पिंडदान और अन्य पितृ कर्म करते हैं। वर्तमान विष्णुपद मंदिर के निर्माण का श्रेय इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर को दिया जाता है। 18वीं शताब्दी में उनके संरक्षण में मंदिर का पुनर्निर्माण कराया गया था।
फल्गु नदी से भी जुड़ी है पिंडदान की परंपरा
गया जी में पिंडदान केवल विष्णुपद मंदिर तक सीमित नहीं है। फल्गु नदी के तट का भी पितृ कर्म में विशेष महत्व माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु यहां तर्पण और पिंडदान करते हैं। गया से जुड़ी धार्मिक कथाओं में फल्गु नदी का उल्लेख विशेष रूप से मिलता है। इसी नदी के किनारे भगवान राम और माता सीता द्वारा राजा दशरथ के लिए पिंडदान करने की कथा भी प्रचलित है।
सीता माता से जुड़ी है पिंडदान की प्रसिद्ध कथा
धार्मिक मान्यता के अनुसार, भगवान राम और माता सीता गया पहुंचे थे, जहां उन्होंने राजा दशरथ का पिंडदान किया। कथा के एक रूप में कहा जाता है कि फल्गु नदी के किनारे माता सीता ने अपने ससुर राजा दशरथ के लिए पिंडदान किया था। इसी वजह से गया जी में सीता कुंड का भी विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। पितृपक्ष के दौरान श्रद्धालु यहां भी धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।
गया को पिंडदान का सबसे बड़ा तीर्थ क्यों माना जाता है?
गया जी की खासियत यह है कि यहां पिंडदान से जुड़ी कई धार्मिक परंपराएं और स्थल एक ही क्षेत्र में मौजूद हैं। गयासुर की कथा से लेकर विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी, सीता कुंड और अन्य पितृ स्थलों तक, पूरा गया क्षेत्र पूर्वजों के श्राद्ध और तर्पण की परंपरा से जुड़ा हुआ है। इसी कारण पितृपक्ष के दौरान यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से लोग पहुंचते हैं और अपने पूर्वजों की शांति व सद्गति की कामना से पिंडदान करते हैं।
क्या पिंडदान सिर्फ गया में ही होता है?
ऐसा नहीं है कि पिंडदान केवल गया जी में ही किया जाता है। हिंदू धार्मिक परंपराओं में कई अन्य तीर्थों और पवित्र नदियों के किनारे भी श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किए जाते हैं। लेकिन गया जी को विशेष महत्व इसलिए मिलता है क्योंकि यहां गयासुर की पौराणिक कथा, भगवान विष्णु के चरणचिह्न, फल्गु नदी और पितृ कर्म से जुड़े कई धार्मिक स्थल एक साथ जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि गया जी को आज भी हिंदू धर्म के प्रमुख पितृतीर्थों में गिना जाता है और पितृपक्ष के दौरान यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों का श्राद्ध और पिंडदान करने पहुंचते हैं।







