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सरकारी नैरेटिव बनाम आम आदमी का मुद्दा

पहल टाइम्स डेस्क by पहल टाइम्स डेस्क
July 13, 2022
in विशेष
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अजीत द्विवेदी

समकालीन दुनिया में या निकट अतीत के इतिहास में सत्तापक्ष और व्यापक रूप से मीडिया में चल रहे विमर्श और आम आदमी से जुड़े मुद्दों में ऐसा डिस्कनेक्ट कहीं देखने को नहीं मिला, जैसा भारत में दिख रहा है। असल में हो कुछ और रहा है लेकिन विमर्श किसी और चीज का है। जैसे घरेलू रसोई गैस के सिलेंडर के दाम में 50 रुपए की बढ़ोतरी हुई लेकिन इस पर पूरे देश में एक पत्ता नहीं खडक़ा। न कहीं मीडिया में इस पर चर्चा है, न कहीं विपक्ष का प्रदर्शन है, न कहीं सिविल सोसायटी का विरोध है और न कहीं आम मध्यवर्गीय नागरिकों की नाराजगी है। इसकी बजाय पूरा देश ‘सर तन से जुदा’ और ‘जब मुल्ले काटे जाएंगेज्’ के नारे पर चल रहे विमर्श में उलझा है। ऐसा नहीं है कि उदयुपर में एक हिंदू दर्जी की गला काट कर हत्या की घटना के बाद इस तरह का विमर्श शुरू हुआ है, बल्कि इस तरह के विमर्शों की निरंतरता में यह एक कड़ी है।

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कितनी हैरानी की बात है कि आम आदमी के जीवन से जुड़े मुद्दे मुख्यधारा के विमर्श से बाहर हो गए हैं और किसी को इसकी चिंता नहीं है। किसी को नहीं लग रहा है कि कुछ ऐसा हो रहा है, जो देश-काल की परिस्थितियों के संगत नहीं है। एक तरफ सरकार और सत्तापक्ष का बनाया नैरेटिव है, जिस पर सारे दिन मुख्यधारा की मीडिया में विमर्श होता है और वर्चुअल प्लेटफॉर्म भी इसी तरह के विमर्श से भरे होते हैं तो दूसरी ओर आम आदमी के मुद्दे हैं या देश व समाज से जुड़े वास्तविक मुद्दे हैं। पहले भी सत्तापक्ष की ओर से प्रायोजित मुद्दों पर चर्चा होती रहती थी और सत्तापक्ष कुछ गढ़े हुए मुद्दों के जरिए वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाता था लेकिन ऐसा नहीं होता था कि वास्तविक मुद्दे विमर्श से पूरी तरह से गायब हो जाएं और प्रायोजित या गढ़े गए मुद्दे ही मुख्यधारा का विमर्श हो जाएं। ऐसा अब हो रहा है। अब सचमुच फ्रिंज ही मेनस्ट्रीम हो गया है।

देश इन दिनों ऐसी गढ़ी हुई समस्याओं के भंवरजाल में उलझा हुआ है, जिससे मुख्यधारा की सारी समस्याओं पर परदा पड़ गया है। यह विमर्श का विषय नहीं है कि घरेलू रसोई गैस के सिलिंडर की कीमत 50 रुपए बढ़ गई और इससे देश के कई शहरों में एक सिलिंडर की कीमत 11 सौ रुपए से ज्यादा हो गई। इस पर भी चर्चा नहीं है कि एक डॉलर की कीमत 80 रुपए के करीब पहुंच गई है। इस पर भी कोई विमर्श नहीं है कि थोक महंगाई की दर 15 फीसदी से ऊपर है और पिछले एक साल से यह दर दहाई में बनी हुई है। अर्थव्यवस्था की स्थिति बताने के लिए अर्थशास्त्र के जानकार ‘स्टैगफ्लेशन’ और ‘सिंकफ्लेशन’ जैसे टर्म्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। ‘स्टैगफ्लेशन’ का मतलब है कि अर्थव्यवस्था स्टैगनेंट यानी थम गई है और इन्फ्लेशन यानी महंगाई तेजी से बढ़ रही है। ‘सिंकफ्लेशन’ का इस्तेमाल इस संदर्भ में हो रहा है कि कंपनियां उपभोक्ताओं की आंखों में धूल झोंकने के लिए कीमत बढ़ाने के साथ साथ पैकेट या डब्बे में पैक सामान की मात्रा घटा रही है। यानी मात्रा सिकुड़ रही है और कीमत बढ़ रही है। देश का हर नागरिक, चाहे वह किसी वर्ग का हो महंगाई का मारा है लेकिन उसकी सोच इससे आगे चली गई दिखती है।

अभी पिछले दिनों बेरोजगारी का आंकड़ा आया, जिसमें बताया गया कि जून के महीने में गांवों में बेरोजगारी की दर आठ फीसदी से ऊपर चली गई और शहरों में भी यह 7.3 फीसदी रही। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के मुताबिक पिछले दो-ढाई साल में बिना लॉकडाउन वाले महीने में पहली बार इस तरह बेरोजगारी बढ़ी है। कोरोना की वजह से लॉकडाउन लगने पर रोजगार में कमी आई थी लेकिन बिना लॉकडाउन के महीनों में जून 2022 का महीना सबसे ज्यादा बेरोजगारी वाला महीना रहा। इस एक महीने में एक करोड़ 30 लाख रोजगार घटे। दिल्ली से सटे हरियाणा जैसे औद्योगिक राज्य में बेरोजगारी की दर 30 फीसदी से ऊपर रही। परंतु यह मुद्दा मुख्यधारा की विमर्श का मुद्दा नहीं है।

हालांकि ऐसा नहीं है कि महंगाई और बेरोजगारी को लेकर कोई बात नहीं कर रहा है। एक खबर की तरह इसके आंकड़े आ रहे हैं और विपक्षी पार्टियां और कुछ स्वतंत्र व प्रतिबद्ध पत्रकार और बुद्धिजीवी इसकी आलोचना भी कर रहे हैं लेकिन इससे आम नागरिक बिल्कुल बेपरवाह या अनजान बना दिख रहा है। उसे ऐसा लग रहा है कि ये समस्याएं उसकी अपनी नहीं हैं, किसी और की हैं। या फिर वह मान रहा है कि महंगाई, बेरोजगारी जैसी निजी समस्याओं से परे देश और समाज की बड़ी व व्यापक समस्याएं हैं, जिनको सुलझाना ज्यादा जरूरी है। चाहे जिस वजह से या जिस माध्यम से हुआ हो उसके लिए हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुददा अपनी रोजी-रोटी की चिंता से बड़ा हो गया है। पहली बार इतने बड़े पैमाने पर दिख रहा है कि धर्म और संस्कृति की चिंता रोटी व रोजगार से बड़ी हो गई है।

पूरा देश स्टॉकहोम सिंड्रोम का शिकार दिख रहा है। उसे लग रहा है या उसे समझा दिया गया है कि रोटी और रोजगार उसका मुख्य सरोकार नहीं है। इनका नहीं होना हो सकता है कि उसके लिए निजी तौर पर परेशानी पैदा करने वाला हो लेकिन देश और समाज के व्यापक हित में उसे इतनी परेशानी उठानी चाहिए। वह इस कदर इस सिंड्रोम से ग्रस्त है कि रोटी और रोजगार की बात करने वाला विपक्ष का नेता उसे अपना दुश्मन दिखाई देता है। उसके दिमाग में यह बात बैठाई गई है कि विपक्ष देश का और नागरिकों का दुश्मन है और विपक्ष के सारे नेता भ्रष्ट व परिवारवादी हैं। हो सकता है कि विपक्ष के कुछ नेता भ्रष्ट हों या कुछ नेताओं पर मुकदमे चल रहे हों या कुछ नेता परिवारवादी हों लेकिन इससे उनकी कही हर बात देश विरोधी नहीं हो जाती है। सवाल है कि विपक्ष जिनके हित की बात कर रहा है अगर उनको ही वह बात पसंद नहीं आ रही है तो क्या किया जा सकता है? विपक्ष के नेताओं को केंद्रीय एजेंसियों के जरिए परेशान किया जा रहा है लेकिन इससे आम नागरिक के मन में कोई सहानुभूति नहीं पैदा हो रही है। वह इसे सही मान रहा है।

असल में हिंदुत्व, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा से आगे देश का आम हिंदू कुछ और नहीं देखना चाहता है? उसके लिए दूसरा नैरेटिव काम नहीं कर रहा है। वह महंगाई, बेरोजगारी को तवज्जो नहीं दे रहा है। वह इस बात पर यकीन नहीं कर रहा है कि सत्तारूढ़ दल धर्म का इस्तेमाल राजनीति के लिए कर रहा है, बल्कि इस बात पर यकीन कर रहा है कि सत्तारूढ़ दल की वजह से हिंदू धर्म की रक्षा हो रही है और हिंदू मजबूत हो रहा है। राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर भी वह अपनी धारणा व्हाट्सऐप पर फॉरवर्ड होकर आने वाले उन गढ़े गए पोस्ट्स से बनाता है, जिसमें बताया जाता है कि आज सारी दुनिया भारत के सामने नतमस्तक है। वह दुनिया भर में प्रतिष्ठित सामरिक जानकारों की इस बात पर यकीन नहीं करता है कि चीन ने भारत की जमीन कब्जा कर ली है या चीन भारत को आर्थिक रूप से गुलाम बना रहा है। इसकी बजाय वह सोशल मीडिया में होने वाले इस प्रचार पर यकीन करता है कि मोदी के दांव से चीन संकट में है!

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